
सेन्ट्रल बैंक ऑफ इंडिया को लेकर सियासत तेज, विपक्ष ने उठाए सवाल
1969 में हुआ था राष्ट्रीयकरण, अब हिस्सेदारी बिक्री की तैयारी
वीना टंडन
नई दिल्ली।देश के बैंकिंग सेक्टर को लेकर एक बार फिर राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। केंद्र सरकार ने सरकारी बैंक Central Bank of India में करीब 8 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की तैयारी शुरू कर दी है। इस कदम से सरकार को लगभग ₹2,455 करोड़ जुटने की उम्मीद जताई जा रही है।
सरकार के इस फैसले के सामने आते ही विपक्ष ने इसे “सरकारी संपत्तियों की बिक्री” करार देते हुए निशाना साधना शुरू कर दिया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार धीरे-धीरे सार्वजनिक संस्थानों को निजी हाथों में सौंपने की दिशा में आगे बढ़ रही है। वहीं, सरकार का कहना है कि यह पूर्ण निजीकरण नहीं बल्कि आंशिक विनिवेश (डिसइन्वेस्टमेंट) है, जिसका उद्देश्य बैंक की पूंजी क्षमता बढ़ाना और उसकी कार्यक्षमता को मजबूत करना है।
1969 का फैसला फिर चर्चा में
इस मुद्दे के बीच देश के बैंकिंग इतिहास का अहम अध्याय भी चर्चा में आ गया है। वर्ष 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi ने देश के 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। उस सूची में Central Bank of India भी शामिल था। उस दौर में इस फैसले को आर्थिक समानता, ग्रामीण क्षेत्रों तक बैंकिंग पहुंचाने और गरीब तबके को वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम माना गया था।
अब, दशकों बाद उसी बैंक में हिस्सेदारी बेचने की तैयारी ने “तब बनाम अब” की बहस को फिर हवा दे दी है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह आर्थिक सुधारों की दिशा में कदम है या फिर सार्वजनिक संपत्तियों के धीरे-धीरे निजीकरण की प्रक्रिया।
सरकार के पास रहेगा नियंत्रण
वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार बैंक में अपनी बहुमत हिस्सेदारी बनाए रखेगी। ऐसे में बैंक का नियंत्रण सार्वजनिक क्षेत्र के पास ही रहेगा और आम ग्राहकों पर तत्काल कोई बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के विनिवेश से सरकार को पूंजी जुटाने और बैंक को बाजार आधारित प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने में मदद मिलती है।
फिलहाल, यह मामला केवल आर्थिक फैसले तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। आने वाले दिनों में संसद से लेकर राजनीतिक मंचों तक इस पर तीखी बहस देखने को मिल सकती है।





