
नई दिल्ली में भारत-यूरोपीय संघ शिखर बैठक:
रणनीतिक साझेदारी को लेकर नए संकेत
वीना टंडन
नई दिल्ली में आयोजित भारत-यूरोपीय संघ शिखर बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डर लेयन की मुलाकात ने वैश्विक राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दिया। औपचारिक माहौल के बीच दोनों नेताओं की बॉडी लैंग्वेज और संवाद को कूटनीतिक हलकों में खास महत्व के साथ देखा जा रहा है।
बैठक के दौरान यूरोपीय संघ और भारत के झंडों से सजे मंच पर जब दोनों नेता आमने-सामने आए, तो सामान्य औपचारिकताओं से अलग कुछ क्षण ऐसे भी रहे जिन्होंने कैमरों और विश्लेषकों का ध्यान खींचा। उर्सुला वॉन डर लेयन ने भारत-यूरोप संबंधों को “भविष्य की साझेदारी” बताते हुए संकेत दिया कि बदलते वैश्विक हालात में भारत की भूमिका अब निर्णायक होती जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष ने भारत को एक ऐसे लोकतांत्रिक साझेदार के रूप में रेखांकित किया जो न केवल तेज़ी से आर्थिक रूप से आगे बढ़ रहा है, बल्कि ग्लोबल साउथ की आवाज भी बन चुका है। रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन की बढ़ती वैश्विक प्रभावशीलता और वैश्विक सप्लाई चेन में आ रही अस्थिरता के बीच यूरोप भारत को एक भरोसेमंद रणनीतिक भागीदार के रूप में देख रहा है।
बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने किसी भी प्रकार की जल्दबाज़ी या दबाव से अलग रुख अपनाते हुए कहा कि भारत अपने निर्णय शांति, संतुलन और वैश्विक हितों को ध्यान में रखकर करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत साझेदारी में विश्वास रखता है, लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों और शर्तों के साथ आगे बढ़ता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी के हाव-भाव और वक्तव्य यह संकेत देते हैं कि भारत अब केवल उभरती शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक दिशा तय करने की स्थिति में है। G20 की अध्यक्षता, तकनीकी प्रगति और विकासशील देशों के मुद्दों पर मुखर भूमिका ने भारत की स्थिति को और मजबूत किया है।
शिखर बैठक के दौरान दोनों नेताओं के बीच दिखी आपसी सहजता और सहयोग की भावना को भारत-यूरोप संबंधों में नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि आने वाले समय में यह साझेदारी केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भू-राजनीतिक और रणनीतिक संतुलन में भी अहम भूमिका निभा सकती है।
कुल मिलाकर, यह मुलाकात एक औपचारिक बैठक से आगे बढ़कर उस संकेत की तरह देखी जा रही है, जहां भारत और यूरोप बदलती वैश्विक व्यवस्था में साथ-साथ चलने की तैयारी कर रहे हैं।


