
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है दिल्ली में गरजेंगी कांग्रेस!
स्टार न्यूज़ टेलीविजन
राकेश पाण्डेय
बिहार में चुनाव के मौके पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामधारी सिंह दिनकर को याद करना नहीं भूलते हैं। लेकिन, लगता है कि इस महान कवि की उक्त कालजयी पंक्ति को समझ कर भी नासमझ बनने की मुद्रा अपनाने में ही प्रधानमंत्री ने अपना फायदा समझा है। वर्ना पिछले करीब हफ्ते भर से सत्ताधारी निजाम जिस तरह से अपने हटाए जाने की देसी ही नहीं, विदेशी तक साजिशों का सरासर झूठा शोर मचाकर, अपने राज में रचे गए चुनावों को ही बेमानी बना देने के संविधान विरोधी, जन तंत्रविरोधी षडयंत्र पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है, उसने दिनकर की उक्त पंक्ति को कब का राष्ट्र-विरोधी घोषित कर दिया होता। क्योंकि कवि ने जनता की इच्छा के लिए, सिंहासन खाली करने की बात तो कही है, लेकिन इसमें साफ-साफ शब्दों में यह शर्त तो जोड़ी ही नहीं है कि चुनाव के जरिए जनता (की इच्छा) आती है! लेकिन दिल्ली में होने वाली कांग्रेस व सहयोगियों की रैली सत्ता पर भारी पड़ेगी?
यह और भी विडंबनापूर्ण है कि अपने विरोधियों और आलोचकों पर, चुनाव के जरिए सत्ता परिवर्तन के जनतांत्रिक तरीके के बजाए, अलोकतांत्रिक तरीकों से सत्ता परिवर्तन का षडयंत्र रचने के आरोप, वही सत्ताधारी संघ-भाजपा गिरोह लगा रहा है, जिस पर इल्जाम ही यह है कि उसने पूरी तरह से पक्षपाती चुनाव आयोग के साथ मिलकर, ठीक चुनाव के जरिए सत्ता परिवर्तन का रास्ता ही रोकने का षडयंत्र रचा है। दूसरे शब्दों में, सत्ताधारियों का विपक्ष पर अलोकतांत्रिक तरीकों से सत्ता परिवर्तन की कोशिश का आरोप, वास्तव में देश में चुनाव को ही निरर्थक बना देने के मौजूदा निजाम के इंतजामों का ही पूरक है। सत्ताधारियों को चिंता है कि इसका इंतजाम तो उन्होंने कर लिया है कि चुनाव के जरिए उन्हें सत्ता से हटाया ही नहीं जा सकता है, लेकिन यह भी ‘जनता के आ धमकने’ से तो पूर्ण सुरक्षा नहीं देता है। तानाशाहों को जनता के आने के खिलाफ सुरक्षा के लिए हमेशा राजकीय हिंसा की जरूरत होती है और जनता से पूर्ण सुरक्षा के लिए, उसकी हरेक हरकत को, हरेक आंदोलन को आपराधिक षडयंत्र बना देने की।
अपने खिलाफ जनता के हरेक आंदोलन को, अपनी हरेक गंभीर आलोचना को, आपराधिक षडयंत्र बना देने में वर्तमान मोदी-शाह निजाम ने भारी महारत हासिल कर ली है। इस जनविरोधी और बुनियादी अर्थ में जनतंत्रविरोधी खेल के सिर्फ तीन खास उदाहरणों की यहां याद दिलाना ही काफी होगा। इसका पहला उदाहरण, भीमा कोरेगांव षडयंत्र केस है, जिसमें एक मुख्यत: दलित गोलबंदी पर, सवर्ण हिंदुत्ववादी गिरोहों की पूरी तरह से अकारण हिंसा का बचाव करने के लिए, इसे शासन को पलटने के तथा प्रधानमंत्री मोदी को हटाने के षडयंत्र में बदल दिया गया। दूसरा उदाहरण, तीन काले कानूनों के खिलाफ देश के किसानों का ऐतिहासिक आंदोलन है, जिसे ‘‘खालिस्तानी आतंकवाद’’ से लेकर, विदेशी टूलकिट तक, न जानेे किस-किस के षडयंत्र की उपज बताने की कोशिश की गयी थी। तीसरा उदाहरण, तथाकथित दिल्ली दंगा वृहत्तर षडयंत्र केस है, जिसके जरिए भारतीय नागरिकता की परिभाषा में एक सरासर अन्यायपूर्ण व असंवैधानिक, सांप्रदायिक बदलाव के खिलाफ आम जनता और विशेष रूप से अल्पसंख्यक मुसलमानों के विरोध को, षडयंत्र साबित करने में शासन की पूरी ताकत लगा दी गयी हैै।
इसलिए, हैरानी की बात नहीं है कि नीट परीक्षा लीक के बहाने, शिक्षा की बहाली तथा रोजगार के अभाव की युवाओं की चिंताओं के गिर्द और कॉकरोच जनता पार्टी तथा वामपंथी छात्र संगठनों की पहल पर, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को केंद्र में रखकर देश में विशेष कर युवाओं या जेन जी की गोलबंदी हुई थी, मोदी राज ने उसे भी अपने खिलाफ देशी-विदेशी षडयंत्र बनाने की और शासन की ताकत के बल पर दबाने की हर मुमकिन कोशिश की थी। यह दूसरी बात है कि दमन के उसके ये हथकंडे उसके लिए उल्टे पड़ गए और उसके अपने मध्यवर्गीय समर्थन आधार में भी दरारें पडऩे लगीं, जिसे संभालने की कोशिश में उसे अपनी “हमारे राज में इस्तीफे नहीं होते” की तानाशाहाना ठसक को छोडक़र, प्रधान का इस्तीफा लेना पड़ा।
इसी सब की पृष्ठïभूमि में, जब यह तथ्य सामने आया कि एसआइआर की प्रक्रिया में, जिससे अब भी देश का एक हिस्सा कवर नहीं हुआ है, पिछली मतदाता सूचियों में रहे पूरे 13 करोड़ 30 लाख नाम बाहर किए जा चुके हैं, जो कि दुनिया के आठ-दस सबसे बड़े देशों को छोडक़र, बाकी सभी देशों की आबादी से भी ज्यादा संख्या है, तो इस प्रक्रिया के साथ शुरूआत से ही लगा रहा ‘‘वोट चोरी’’ का संदेह यकीन में बदल गया और इसकी आलोचनाएं एक जन-विक्षोभ में। राजधानी दिल्ली में, जहां हर तीसरा मतदाता इसकी कैंची के नीचे आ गया और दो चुनाव आयुक्तों समेत, अनेक वीआइपी मतदाताओं का वोट खतरे में आ गया, जिनके लिए चुनाव आयोग को संबंधित एप में अलग से विशेष व्यवस्था भी करनी पड़ी और दूसरी ओर, कई मतदान केंद्रों पर करीब सारे के सारे वोट ही एसआइआर की कैंची के नीचे आ गए, मीडिया में अपेक्षाकृत अधिक तथा मतदाताओं के प्रति सहानुभूति पूर्ण कवरेज ने इस विभीषिका को देश भर के सामने गहरे रंग से रेखांकित कर दिया।
*इसी पृष्ठभूमि में आए इंडियन एक्सप्रेस तथा अन्य प्रकाशनों के रहस्योदघाटनों ने विपक्ष की बदतरीन आशंकाओं की सचाई के सबूत पेश कर दिए*
अब यह साफ था कि मतदाता सूचियों में फेर-बदल की सारी प्रक्रिया, खुद चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं से भी स्वतंत्र, एक गुट-विशेष या कोटरी के ही हाथों में केंद्रित हो गयी थी, जो पूरी तरह से मनमाने तथा अपारदर्शी तरीके से इस प्रक्रिया को संचालित कर रही थी। इसे खुद चुनाव आयुक्तों के बहुमत को किनारे कर के सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त की इच्छा से संचालित किया जा रहा था और इस व्यवस्था के तार सत्ता के शीर्ष से जुड़े हुए थे। ईसीआइनेट के जिस कंप्यूटरी ताने-बाने के जरिए इस समूची प्रक्रिया को संचालित किया जा रहा था, उसका नियंत्रण पूरी तरह से केंद्र के चंद खासुल खासों तक सीमित था। दूसरी ओर, जो ईआरओ कानूनन मतदाता सूचियों में नाम जोडऩे-हटाने के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें इस प्रक्रिया में पूरी तरह से अधिकारहीन बना दिया गया था।
यह कुल मिलाकर चुनाव को ही बेमानी बनाकर, जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति में जनतंत्र का ही रास्ता बंद कर दिए जाने की कोशिश है। स्वाभाविक रूप से जनतंत्र की परवाह करने वाली सभी ताकतें, अपनी तमाम भिन्नताओं के बावजूद, जनतंत्र के इस अपहरण के खिलाफ प्रतिरोध के लिए सामने आ रही हैं। इमर्जेंसी का अनुभव गवाह है कि इस देश में जनतंत्र की कद्र करने वाली ताकतों का दायरा बहुत बड़ा है। और यही संघ-भाजपा और उनके मौजूदा निजाम की बौखलाहट का असली कारण है।
वे बदनाम करने से लेकर राजकीय-निजी सेनाओं के जरिए दमन तक, अपने सारे हथियार आजमा कर भी इस तूफान को रोक नहीं पाएंगे। यह भी याद रहे कि वे ही हैं, जो हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था में, विश्वसनीय चुनाव के जरिए सत्ता परिवर्तन का रास्ता बंद करने की कोशिश कर रहे हैं। वे सत्ता के बल पर जनता की इच्छा को हमेशा के लिए दबा तो नहीं सकते हैं, हां! चुनाव के जरिए उसकी अभिव्यक्त का रास्ता बंद कर के अपने फासीवादी तरीकों से, जनता की इच्छा को अपने प्रकटीकरण के दूसरे रास्तों की ओर जरूर धकेल सकते हैं। चुनावों की विश्वसनीयता और पवित्रता की रक्षा के लिए, आज जो ताकतें लड़ रही हैं, वे ही इसकी इकलौती गारंटी हैं कि भारत में रिजीम चेंज किसी बांग्लादेश या नेपाल की तरह नहीं हो। वर्ना सत्ताधारी संघ-भाजपा तो भारत को बांग्लादेश या नेपाल के रास्ते पर धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। उनके लिए इतिहास का एक ही संदेश है — सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!





