
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का नया अभियान: कानून की पढ़ाई के लिए मुस्लिम युवाओं से आगे आने की अपील
वीना टंडन
नई दिल्ली।मौजूदा सामाजिक-कानूनी परिस्थितियों को देखते हुए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुस्लिम बच्चों और युवाओं को कानून की पढ़ाई के लिए प्रेरित करने का एक विशेष अभियान शुरू किया है। बोर्ड का उद्देश्य भविष्य में बड़ी संख्या में प्रशिक्षित और सक्षम मुस्लिम वकील तैयार करना है, ताकि समुदाय अपने कानूनी अधिकारों की प्रभावी ढंग से पैरवी कर सके।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष हज़रत मौलाना ख़ालिद सैफ़ुल्लाह रहमानी ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस अभियान की रूपरेखा साझा की। उन्होंने कहा कि अब मुसलमानों को गंभीरता के साथ क़ानून की शिक्षा पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, आज की परिस्थितियों में मुस्लिम युवाओं को कानून के अध्ययन के लिए आकर्षित करना, उन्हें उच्च स्तर का कौशल दिलाना और अदालतों तक विशेषज्ञ मुस्लिम वकीलों की पहुंच सुनिश्चित करना समय की मांग बन गई है।
मौलाना रहमानी ने चिंता जताई कि कई बार सामान्य वकील मुस्लिम समुदाय से जुड़े मामलों को लेने से भी इनकार कर देते हैं। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर लोग या वे लोग, जो कई मामलों में निर्दोष होते हुए भी मुकदमों में फंस जाते हैं, गंभीर संकट का सामना करते हैं। उनका कहना है कि यदि समुदाय में बड़ी संख्या में प्रशिक्षित वकील होंगे तो न केवल कानूनी लड़ाई बेहतर ढंग से लड़ी जा सकेगी, बल्कि न्याय मिलने की संभावना भी बढ़ेगी।
उन्होंने यह भी कहा कि देश के उच्च न्यायालयों में मुस्लिम न्यायाधीशों की संख्या लगातार घट रही है। मौलाना रहमानी के अनुसार, अच्छे और काबिल वकील ही आगे चलकर न्यायाधीश बनते हैं। यदि आज मुस्लिम समाज कानून के क्षेत्र में निवेश नहीं करेगा, तो भविष्य में न्यायिक व्यवस्था में उसकी भागीदारी और कमजोर होती चली जाएगी। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि मुस्लिम समाज में आधुनिक शिक्षा का रुझान बढ़ा है, लेकिन अधिकांश युवाओं की पसंद अब भी मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों तक सीमित है, जो महत्वपूर्ण होने के बावजूद पर्याप्त नहीं हैं।
इस अभियान को जहां एक वर्ग से समर्थन और सराहना मिल रही है, वहीं सोशल मीडिया पर इसकी आलोचना भी देखने को मिल रही है। कुछ लोगों का कहना है कि केवल अपील या पोस्ट करने से ज़मीनी बदलाव नहीं आएगा। सोशल मीडिया पर रिज़वान ख़ान ने व्यंग्य करते हुए लिखा, “सिर्फ पोस्ट करने से कौन वकील बन जाएगा?” वहीं मिन्हाज अहमद ने सवाल उठाया कि क्या बोर्ड खुद कोई लॉ कॉलेज चलाता है या कानून की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति अथवा स्पॉन्सरशिप जैसी ठोस सुविधाएं उपलब्ध कराता है।
आलोचकों का यह भी तर्क है कि जब न तो कोई लॉ कॉलेज संचालित किया जा रहा है और न ही मुस्लिम कानून के छात्रों के लिए आर्थिक सहायता की स्पष्ट व्यवस्था है, तो केवल अभियान से अभिभावकों और छात्रों में अतिरिक्त रुचि पैदा होना कठिन है। कुछ लोगों ने तंज कसते हुए यहां तक लिख दिया कि “अब तो लॉ कॉलेज ही बंद करवा दो।”
हालांकि, बोर्ड से जुड़े लोगों और समर्थकों का कहना है कि इस पहल को महज़ एक अपील के रूप में नहीं, बल्कि सोच में बदलाव की शुरुआत के तौर पर देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, किसी भी बड़े सामाजिक परिवर्तन की नींव विचार और जागरूकता से ही पड़ती है। यह अभियान कम से कम इस दिशा में एक गंभीर बहस को जन्म दे रहा है कि मुस्लिम समाज को केवल चुनिंदा पेशों तक सीमित न रहकर कानून, न्याय और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करानी चाहिए।


