
वक़्फ़ बिल: हक़ की लड़ाई या नई साज़िश?
जौवाद हसन (स्वतंत्र पत्रकार)
जो लोग हमारी अज़ानों से चिढ़ते हैं, जिन्हें हमारी सड़कों पर अदा की गई नमाज़ से परेशानी होती है, जिनकी संसद में एक भी मुस्लिम नुमाइंदगी नहीं होती—आज वही हमें यह यक़ीन दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि वक़्फ़ बिल हमारे हक़ में लाया गया है! क्या यह मज़ाक़ नहीं? क्या यह वही लोग नहीं हैं जो हर क़दम पर हमारी पहचान मिटाने की कोशिश करते आए हैं?
जो लोग हमारी मस्जिदों को निशाना बनाते हैं, हमारी दरगाहों को शक़ की नज़रों से देखते हैं, हमारे मदरसों को बंद करने की बात करते हैं, जो हमारे घरों पर बुलडोज़र चलाते हैं—आज वही हमें यह बताने चले हैं कि वे हमारी भलाई के लिए क़ानून बना रहे हैं? क्या नफ़रत की बुनियाद पर खड़ी कोई भी हुकूमत हमारे हितैषी हो सकती है?
अगर यह बिल वाक़ई हमारे भले के लिए होता, तो हमारे रहनुमाओं से मशवरा किया जाता, हमारे उलमा से राय ली जाती, हमारी क़ौम की आवाज़ सुनी जाती। लेकिन यह तो हमें बताए बिना, हमें समेटने की साज़िश है। मसाजिद, मदरसे, कब्रिस्तान और समाजी भलाई के लिए वक़्फ़ की गई ज़मीनें हमारी तहज़ीब और हमारी पहचान का हिस्सा हैं। उन्हें हमसे छीनने की कोई भी कोशिश हमारी मज़हबी और समाजी विरासत पर हमला है।
हम यह साफ़ कर देना चाहते हैं कि हम नाइंसाफ़ी को क़ुबूल नहीं करेंगे। यह सिर्फ़ ज़मीन का मसला नहीं, बल्कि हमारी मज़हबी, समाजी और तारीखी पहचान की लड़ाई है। जब भी हमारे हक़ छिने गए हैं, हमने आवाज़ उठाई है। आज भी हम इसी हिम्मत और यक़ीन के साथ कह रहे हैं कि हम अपने वक़्फ़ की हिफ़ाज़त करेंगे, हर जायज़, क़ानूनी और लोकतांत्रिक रास्ता अपनाएंगे।
हमारे ख़िलाफ़ कितनी ही साज़िशें रची जाएं, मगर हमारी हिम्मत और हक़ पर यक़ीन पहले से ज़्यादा मजबूत होता जाएगा। इतिहास गवाह है कि जब भी ज़ुल्म ने सिर उठाया, इंसाफ़ ने उसे शिकस्त दी। आज भी यही होगा। हमें अपने हक़ के लिए आवाज़ बुलंद करनी होगी, अपने वजूद को बचाने के लिए एकजुट होना होगा। हमारी पहचान, हमारी तहज़ीब और हमारी इमारतों की हिफ़ाज़त हमारा हक़ भी है और फ़र्ज़ भी।