
मुसलमानों के लिए ‘वंदे मातरम्’ गायन धार्मिक दृष्टि से संभव नहीं: मदनी
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वीना टंडन
नई दिल्ली। जमीयत उलमा-ए-हिंद के वरिष्ठ नेता सय्यद अहमद मदनी ने स्पष्ट किया है कि मुसलमान किसी भी परिस्थिति में ‘वंदे मातरम्’ को पढ़ने या गाने के लिए मजबूर नहीं किए जा सकते। उन्होंने कहा कि इस गीत की कुछ पंक्तियां इस्लामी आस्था के खिलाफ हैं। विशेष रूप से इसमें देश को ‘दुर्गा माता’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है और उसकी पूजा के शब्द प्रयुक्त हैं, जो मुसलमानों की बुनियादी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत हैं।
मदनी ने बताया कि भारतीय संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) देता है। इन अधिकारों के तहत किसी को उसके धार्मिक विश्वास के खिलाफ किसी नारे, गीत या विचार को अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा, “वतन से मोहब्बत करना अलग बात है और उसकी पूजा करना अलग। मुसलमानों की देशभक्ति किसी प्रमाण-पत्र की मोहताज नहीं। आजादी की लड़ाई में मुसलमानों और जमीयत के बुजुर्गों की कुर्बानियां तथा देश की एकता के लिए उनकी कोशिशें अविस्मरणीय हैं। देशभक्ति का संबंध दिल की सच्चाई और अमल से है, न कि नारेबाजी से।”
मदनी ने बताया कि ‘वंदे मातरम्’ बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंदमठ’ का अंश है और इसके शब्द हिंदू देवी दुर्गा की पूजा को संबोधित करते हैं। “इस गीत का अर्थ है ‘मां, मैं तेरी पूजा करता हूं’। इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी के सामने झुकना या पूजा करना मना है। इसलिए मुसलमान इसे स्वीकार नहीं कर सकते। मरना स्वीकार है, लेकिन शिर्क (अल्लाह के साथ किसी को साझी मानना) स्वीकार नहीं। मरेंगे तो इस्लाम पर और जिएंगे तो इस्लाम पर, इंशा अल्लाह।”
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