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धर्म बदलने के कानून से मौलिक अधिकार खतरे में’, मदनी का गंभीर आरोप

धर्म बदलने के कानून से मौलिक अधिकार खतरे में’, मदनी का गंभीर आरोप

वीना टंडन
नई दिल्ली।जमीअत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने देश में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि संविधान द्वारा प्रदत्त धर्म की आज़ादी का अधिकार धर्मांतरण कानूनों के नाम पर समाप्त किया जा रहा है।
मदनी ने कहा, “हमारे देश के संविधान ने हर नागरिक को अपनी पसंद का धर्म मानने और अपनाने की आज़ादी दी है, लेकिन मौजूदा धर्म परिवर्तन कानून इस मूल अधिकार को खत्म करने का हथियार बन गए हैं। हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि किसी धर्म को मानने वाला भय और सजा के साए में जीने को मजबूर है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि धर्मांतरण के मामलों में एकतरफा कार्रवाई हो रही है। “‘घर वापसी’ के नाम पर लोगों को एक खास धर्म में भेजने वालों को पूरी छूट मिली हुई है। न उनसे पूछताछ होती है, न उनके खिलाफ कार्यवाही।”

‘देश के हालात बेहद चिंताजनक’
मदनी ने कहा कि देश का मौजूदा माहौल संवेदनशील और चिंताजनक है।
उनके अनुसार, “एक विशेष समुदाय को निशाने पर लिया जा रहा है, जबकि दूसरा समुदाय कानूनी, सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर किया जा रहा है। बुलडोज़र कार्रवाई, मॉब लिंचिंग, वक्फ संपत्तियों पर कब्ज़ा और मदरसों के खिलाफ नकारात्मक अभियान चलाकर उनकी पहचान और अस्तित्व को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है… मुसलमान आज सड़क पर चलते हुए भी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है।”

‘सुप्रीम कोर्ट सरकार के दबाव में काम कर रहा है’
मदनी ने न्यायपालिका की भूमिका पर भी सवाल उठाए।
उन्होंने कहा, “बाबरी मस्जिद, तीन तलाक और कई अन्य फैसलों के बाद ऐसा लगता है कि अदालतें पिछले कुछ सालों से सरकार के दबाव में कार्य कर रही हैं। हमारे पास कई उदाहरण हैं जो अदालतों के चरित्र पर सवाल खड़े करते हैं। सुप्रीम कोर्ट तभी ‘सुप्रीम’ कहलाने का हकदार है, जब वह संविधान और कानून को सर्वोपरि माने। अगर वह ऐसा नहीं करता, तो वह सुप्रीम कहलाने के लायक नहीं है।”

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