
जनसांख्यिकी परिवर्तन आयोग या ‘हिंदू राज’ की ओर लंबी छलांग!
राकेश पाण्डेय
मोदीशाही के इरादों को समझने के लिए, क्रोनोलॉजी समझना कितना जरूरी है, यह अमित शाह खुद अपने मुंह से बता चुके हैं। सो जनसांख्यिकी परिवर्तन आयोग का मकसद समझने के लिए उसके आगे-पीछे की क्रोनोलॉजी से शुरू करना उपयोगी रहेगा।
सभी जानते हैं कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अपने हिसाब से बड़ी कामयाबी और खासतौर पर प. बंगाल में फतेह का झंडा गाड़ने के फौरन बाद, मई के आखिर में मोदी सरकार ने जनसांख्यिकी परिवर्तन पर उच्च स्तरीय कमेटी के गठन का ऐलान कर दिया।
इसकी दिशा में बढ़ने की औपचारिक शुरूआत, 2025 के प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस भाषण से हुई थी। लाल किले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कथित ‘घुसपैठ’ से देश के लिए भारी खतरा बताते हुए, ऐसे आयोग के गठन के जरूरी होने का ऐलान किया था। इसकी भी एकदम तात्कालिक क्रोनोलॉजी तो यही थी कि 2025 के अप्रैल के आखिर में पहलगाम में आतंकी हमले ने जब जम्मू-कश्मीर में करीब पांच साल से जारी सीधे केंद्रीय शासन में सब कुछ सामान्य हो जाने के झूठे प्रचार की चिंदियां उड़ा दीं, उसके फौरन बाद ध्यान बंटाने के लिए संघ परिवार की ओर से देश के कई हिस्सों में आम तौर पर मुसलमानों और खासतौर पर कश्मीरियों को निशाना बनाया गया था।
सीएए के व्यापक जनतांत्रिक विरोध को मोदीशाही अपने दमनतंत्र के सहारे तो पूरी तरह से नहीं कुचल सकी, पर उसका जवाब उसने मुस्लिम विरोधी आक्रामकता बढ़ाने के जरिए दिया। खासतौर पर, बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव के समय, गृहमंत्री अमित शाह ने न सिर्फ चर्चित तरीके से अपने राज की क्रोनोलॉजी समझायी कि कैसे पहले सीएए से मुसलमानों को नागरिकता अधिकार से परे कर के ‘घुसपैठिया’ बनाया जाएगा और फिर, हिंदुओं आदि अन्य को नागरिकता दी जाएगी, बल्कि उन्होंने कहा कि घुसपैठिये ‘दीमक हैं, उन्हें चुन-चुनकर, एक-एक को निकाल बाहर करेंगे।’
बंगाल से ही इस घुसपैठिया राग को संघ-भाजपा के प्रचार की मुख्य थीम बनाने की शुरूआत हुई, जिसे 2024 के आम चुनाव तक आते-आते मोदीशाही ने देश के पैमाने पर प्रचार की अपनी एक मुख्य थीम बना लिया। बेशक, इस आम चुनाव में मोदी खुद खासतौर पर मतदान के शुरूआती चरणों में बिहार, बंगाल, झारखंड में घुसपैठियों के खतरे के राग से शुरूआत करने के बाद, बाजी हाथ से निकलती नजर आने की हताशा में जल्द ही, विरोधी ‘मंगलसूत्र छीन लेंगे और ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों (मुसलमानों) को दे देंगे’ पर पहुंच गए, जबकि आदित्यनाथ जैसे उनकी पार्टी के अन्य प्रमुख प्रचारक ‘बंटोगे तो कटोगे’ के अपने नारों के साथ, सीधे मुस्लिम विरोधी नारों से शुरूआत ही कर रहे थे।
इसीलिए, एसआईआर के अगले चरण में और खासतौर पर प. बंगाल में चुनाव आयोग ने, एसआईआर में ही सुधार कर लिया और’तार्किक विसंगति’ की अनोखी श्रेणी का आविष्कार कर, खास तौर पर सुनिश्चित किया कि मुसलमान जैसे लगने वाले नामों को छांटकर संदिग्ध घुसपैठियों के खाने में डाला जाए। इसी का नतीजा, न सिर्फ 27 लाख लोगों के, जिनमें मुसलमानों का फीसद बहुत ज्यादा है, न्यायाधीन होते हुए भी मताधिकार से वंचित किए जाने के रूप में सामने आया बल्कि 72 चुनाव अधिकारियों के ही सिर्फ इसलिए मताधिकार से वंचित कर दिए जाने के रूप में भी सामने आया कि वे सभी मुसलमान थे।
इस तरह, गृहमंत्री अमित शाह बार-बार, तथाकथित घुसपैठियों के लिए अपने राज की जिस ‘डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट’ नीति का ऐलान करते रहे हैं, उसके डिटेक्ट और डिलीट के पहले दो चरण मोदीशाही के अंगूठे के नीचे दबे चुनाव आयोग ने एक प्रकार से संभाल लिए हैं। पर इसमें एक समस्या है। चुनाव आयोग भी ईमानदारी से डिटेक्ट करे, तो उसे किसी उल्लेखनीय संख्या में वास्तविक घुसपैठिए नहीं मिलेंगे। क्यों? क्योंकि बड़े पैमाने पर विदेशी घुसपैठ और उसमें भी मुसलमानों की घुसपैठ, एक मिथक है, जो आरएसएस के सांप्रदायिक प्रचार से निकला है। उल्टे बांग्लादेश की स्थापना के समय की उथल-पुथल के बाद से, वहां से अवैध रूप से आकर भारत में बसने वालों में हिंदुओं की ही संख्या ज्यादा है। दूसरी ओर, आमतौर पर बांग्लादेशी मुसलमानों के लिए ऐसे देश में जाकर बसने का क्या आकर्षण हो सकता है, जिसकी प्रति व्यक्ति आय तथा मानव विकास का दर्जा, उनके अपने देश से कुछ न कुछ नीचे ही है और जहां मुसलमानों के लिए असुरक्षा बढ़ती जा रही है। इस सच्चाई के सामने यही आसान और वर्तमान सत्ताधारियों के लिए उपयोगी है कि घुसपैठिया और मुसलमान को समानार्थी बना दिया जाए।
इस आयोग के मकसद में अगर किसी को संदेह हो भी, तो इस तथ्य से दूर हो जाना चाहिए कि आयोग की विचार शर्तों में ‘अवैध आप्रवास’ से निपटने की जरूरत को प्रमुखता दी गयी है। और अमित शाह ने इस कदम के सिलसिले में बाकायदा बयान दिया है कि, ‘अवैध घुसपैठ तथा अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय बदलाव के दूसरे कारण, किसी राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य के लिए, एक बहुत बड़ी चुनौती हैं।’ अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय बदलाव के ‘दूसरे कारण’ का इशारा लगता है कि मुसलमानों की कुल प्रजनन दर की ओर है, जिसके खतरा माने जाने के निहितार्थ और भी अनिष्टकर लगते हैं। क्या इस आयोग का उपयोग, डिपोर्ट होने से बच गए मुसलमानों के अधिकारों को और कमतर करने का रास्ता बनाने लिए किया जाएगा? पर इसकी चर्चा फिर कभी और।
*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)*






