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चढ़ावा चोर से वोट चोर तक मिल रहा सबको अभयदान?

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राकेश पाण्डेय

भारत के दार्शनिक वृतांत में एक रोचक कथा है, अद्वैतवादी आदि शंकराचार्य की कथनी और करनी के द्वैत की कथा। जगत को सच्चा और गतिशील मानने और सवाल उठाने के बुद्ध के सहज और सुलभ बौद्धिक प्रभाव वाले भारत को एक बार पुनः उलझाने वाले फलसफे में पहुंचाने के उद्देश्य से अद्वैतवाद — दूसरा न कोई — के मत को लेकर शंकराचार्य जम्बूद्वीप में निकले। ‘ब्रह्मम सत्यम जगत मिथ्या’ के अपने इस सिद्धांत का बखान करते हुए उन्होंने कहा कि जो भी प्रकट है, दर्शनीय है, महसूस होता है, अस्तित्वमान है, वह असल में है ही नहीं ; मिथ्या है, आँखों का भ्रम है, झूठा है, अस्तित्वहीन है। सच्चा तो सिर्फ ब्रह्म है। अपने इस ज्ञान को देश भर में बांटते हुए वे जगह-जगह जाकर प्रवचन दे रहे थे। केरल के एक गाँव में जब ऐसे ही एक प्रवचन के दौरान वे भक्तों को बता रहे थे कि भूख, प्यास, दरिद्रता, विपन्नता मिथ्या है, यहाँ तक कि जिस वृक्ष की छाया में बैठकर वे उन्हें सुन रहे हैं, उसका होना भी झूठ है, भ्रम है, असल तो केवल ब्रह्म है। उनके इस उपदेश के बीच ही सामने से एक मदमस्त हाथी दौड़ता हुआ आया। हाथी को अपनी तरफ आते देख उपदेश दे रहे आदि शंकराचार्य और उनके शिष्य तुरंत अपनी जान बचाने के लिए द्रुतगति से भाग खड़े हुए। कुछ देर बाद जब मदमस्त हाथी दूर चले गए और स्थिति सामान्य हुई, तो कुछ शिष्यों ने कौतूहल से, कुछ ने मजे लेने के लिए शंकराचार्य से पूछा कि : “हे गुरुदेव! अभी कुछ देर पहले ही आप कह रहे थे कि यह संसार पूरी तरह से मिथ्या, भ्रम और माया है। यदि यह संसार और यह हाथी मिथ्या ही थे, तो फिर आप हाथी को आता देख उससे डरकर भागे क्यों?” आदि शंकराचार्य ने मुस्कुराते हुए बहुत ही ढीठ चतुराई के साथ उत्तर दिया कि : “हे वत्स, जिस तरह हाथी का आना मिथ्या था, उसी तरह उस हाथी को देखकर मेरा भागना भी उतना ही मिथ्या था।”

ताजातरीन कारनामा अयोध्या के राममंदिर में हुई चढ़ावा चोरी काण्ड है। पहले तो चोरी को ही मिथ्या बताया गया। चोरी को चोरी कहने वालों को धर्मद्रोही और देश द्रोही करार दिया गया। भक्तों की नाराजगी को बहलाने के लिए सचमुच की मिथ्या जांच के बाद अब इस काण्ड के सर्वेसर्वा और सबूतों के साथ प्रमाणित अपराधी चम्पत राय एंड कंपनी को क्लीन चिट दे दी गयी है : सरकारी गवाह बना लिया गया है। एसआईटी जांच और पुलिस की चार्जशीट के अनुसार, कुल 8 लोगों को आरोपी बनाया गया है । फैजाबाद की विशेष अदालत में दाखिल की गयी कुल 73,480 पन्नों की चार्जशीट की यह एक झलक ही साफ़ कर देती है कि जांच करने वालों दिया गया काम चोरों को पकड़ने का नहीं, उनके सरगनाओं को बचाने का था।

हालांकि यह क्लीन चिट देने वाली रिपोर्ट भी चम्पत राय की करनी को छुपाने और उन्हें बचाने की लाख कोशिशों के बाद भी ऐसे तथ्य दर्ज करती है, जो उसकी आपराधिक लिप्तता को दर्ज करते हैं। पुलिस चार्जशीट के मुताबिक़, चार जून को चढ़ावा गिनने के काम में लगे एक गणना कर्मी ने चंपत राय को मोबाइल पर चढ़ावा चोरी की वीडियो भेजकर जानकारी दी थी। मगर बजाय पुलिस को इत्तला देने के चम्पत राय ने इस वीडियो में दिख रहे चोरी के माल को अपनी सुपुर्दगी में ले लिया और 21 दिनों तक अपने पास ही रखा। यह बात चोरी के आरोपियों ने अपने बयान में बताया कि चुराया गया माल चंपत राय, गोपाल राव ने ले लिया था। जांच शुरू होने के बाद भी चम्पत राय ने इसकी जानकारी पुलिस को नहीं दी। खुद आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने ट्रस्ट के लॉकर कक्ष से चोरी का माल अपने कब्जे में लिया। क़ानून के हिसाब से चोरी के माल की बरामदगी के लिए लिखा-पढ़ी समेत कई नियमों का पालन करना होता है। यदि चोरी का माल कहीं रखा गया है अथवा किसी को मिला है, तो थाने को सूचना देनी होती है। यह सब नहीं हुआ। यह तथ्य स्वयं अपनी जांच रिपोर्ट में पुलिस ने बयान किया है, मगर इतना सब लिखने के बाद भी चम्पत राय को मुजरिम नहीं बनाया गया – उलटे सरकारी गवाह बनाकर उन्हें अभयदान दे दिया गया।

सब कुछ सबके सामने होने, सारे तथ्य और प्रमाण उजागर होने के बाद भी बेशर्म दीदादिलेरी के साथ इतनी हेकड़ी करने की हिम्मत कहाँ से आती है? कानूनों अदालतों की परवाह न करने का इत्ता पक्का भरोसा कहाँ से आता है? यह उस सर्वसत्तावाद से आता है, जो पिछले एक दशक से अपनी जकड़न का दायरा बढ़ाते-बढ़ाते आज यहाँ तक पहुँच गया है। शंकराचार्य की कथा के हिसाब से अब संघ – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ – ही सत्य है, बाकी सब मिथ्या है। जो उनके साथ है, उनके लिए वही ब्रह्म है – बाकी सब भरम है। सारे दुष्टों, भ्रष्टों, बलात्कारियों, व्यभिचारियों, हत्यारों, लुटेरों को अपने में समाहित करके यह काम राजनीति में पहले ही किया जा चुका था। आसारामों, गुरमीत राम रहीमों जैसों के जरिये धर्म के क्षेत्र में भी इसे पहुंचाया जा चुका था। मंदिरों में सेंध लगवाना तो इसका मामूली सहउत्पाद – बाय प्रोडक्ट – है ।

संघ और भाजपा दोनों को पता है कि 1980 में नए नाम से अवतार लेने के बाद हुए पहले ही लोकसभा चुनाव में जनता ने उसे मात्र 2 लोकसभा सीटों पर सिमटा दिया था। इससे उबरने के लिए जिस नफरती साम्प्रदायिकता की पूंछ पकड़ कर उन्होंने गुब्बारा फुलाया है, उसमें सबसे ज्यादा हवा अयोध्या के मंदिर के नाम पर ही भरी गयी है। इसमें हुई वारदात के लिए चम्पत या सम्पत किसी के खिलाफ भी कार्यवाही होने देना ठगी और चोरी को कबूल करना होगा, सारी हवा निकाल देने वाली आपत्ति-विपत्ति को न्यौता देना होगा। धर्म के नाम पर ठगी करने वाले हुक्मरान अच्छी तरह जानते हैं कि चम्पत फंसे, तो वह सारा तिलिस्म भी चम्पत हो जाएगा जिसे बड़े जतन के साथ रचा गया है, इसलिए क़ानून कुछ भी कहे, उनका बचना जरूरी है। इसलिए भी कि चम्पत राय तो सिर्फ जरिया है : एक पासवर्ड है। चम्पत राय तो व्यक्ति है, असल कसूरवार तो वह प्रवृत्ति है, वह विचार है, जिसने राममंदिर को अपना एटीएम और कुबेर के खजाने की डुप्लीकेट चाबी बनाया हुआ है। चम्पत राय और चालीस चोरों के खजाने के खुलने का कोड “खुल जा सिम सिम” हैं। वे कोषागार तक पहुँचने वाली वह सुरंग हैं, जो बिना आवाज किये इधर का उधर कर देती है।

यहां याद दिलाना जरूरी है कि राम मन्दिर चढ़ावा चोरी काण्ड सिर्फ क़ानून व्यवस्था का मामला नहीं है : कुछ सौ करोड़ रूपये इधर-उधर होने का प्रकरण नहीं है। यह धर्म में विश्वास करने वाले करोड़ों भोले और श्रद्धालु लोगों की आस्था और विश्वास के साथ किया गया छल और धोखा है। मगर यह चौर्यवृत्ति सिर्फ यहीं तक रुकने वाली नहीं है। जो गिरोह, जिस राम के नाम पर सत्ता में पहुंचा, उन्हें धोखा दे सकता है, वह देश के संविधान, लोकतंत्र और उसकी कौमी एकता की सबसे मजबूत पहचान धर्मनिरपेक्षता के साथ ठगी करने से भी बाज नहीं आयेगा। चुनाव आयोग में बैठे संघ-पूत ज्ञानेश कुमार की अगुआई में हुई 13 करोड़ वोटों की चोरी का भण्डाफोड़ इसकी एक मिसाल है। ध्यान रहे यह ज्ञानेश कुमार राम मन्दिर न्यास के शुरूआती काल में उससे जुड़े रहे हैं और जानकार बताते हैं कि वोट चोरी के पहले वे चढ़ावा के नोट चोरी प्रसंग से भी उनका गहरा नाता रहा है।

भारत के निर्वाचन कानूनों की धज्जियां उड़ाकर सारे पोलिंग बूथ के प्रभारी तक के अधिकार अपने और अपनी आईटी प्रमुख शीला खन्ना के हाथों में ले लेने के पीछे इरादा क्या था, यह सामने आ गया है। झारखण्ड में चुन-चुनकर मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 में जमा किये गए आवेदन, दिल्ली में झुग्गी बस्तियों के सैकड़ों नामों का एक साथ हटाया जाना, खुद चुनाव आयोग द्वारा लाखों नाम मतदाता सूची से हटाये जाने की दरखास्त लगाना ऐसे कुछ मामले हैं, जिनसे साफ़ हो जाता है कि ज्ञानेश कुमार की जकड़ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पकड़ वाला चुनाव आयोग संघ के एजेंडे को लागू कर रहा था। बिना संविधान बदले ही उसकी धज्जियां उड़ा रहा था : मतदाता सूची का ‘शुद्धिकरण’ करके, संघ जिन्हें अपना गुरु जी बताता है, उन एम एस गोलवलकर की कुख्यात किताब ‘हम और हमारी राष्ट्रीयता’ में लिखे निर्देश कि “मुसलमान इस देश में रह सकते हैं, मगर उन्हें किसी भी लोकतांत्रिक अधिकार के बिना दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में रहना होगा” को अमल में ला रहा था। वोटर लिस्ट में आम मतदाता और ख़ास मतदाता – वीआईपी – की श्रेणियां बनाकर गुरु जी के कहे के हिसाब से दुरुस्ती कर रहा था। संघ हरेक को वोट का अधिकार देने वाले लोकतंत्र का मुखर विरोधी है। गोलवलकर इसे मुंडगणना कहकर त्याज्य बताते थे। उनके हिसाब से राज चलाने का शुद्ध हिन्दुत्वी तरीका है समाज के गणमान्य व्यक्तियों के हाथ में उसे सौंप देना। ‘गणमान्य व्यक्तियों’ की उनकी परिभाषा मनुस्मृति पर आधारित थी। उन्होंने भारतवासी होने के आधार भी तय किये थे। जाति, वर्ण, लिंग आधारित उंच-नीच और श्रेणीक्रम को शास्त्रसम्मत ठहराया था और उसे कड़ाई से लागू करना राष्ट्र का आधार बताया था। ठीक यही काम है, जो संघ दक्ष ज्ञानेश कुमार और शीला खन्ना जैसे उसके पसंदीदा कारकून चुनाव आयोग में बैठकर कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री न मंदिर चढ़ावा चोरी पर कुछ बोले थे, न ज्ञानेश कुमार की वोट चोरी पर मुंह खोले हैं। वे भजन मण्डली में खंजरी बजा रहे हैं। ऊँट की पूंछ से ऊँट बांधकर लूट के दायरे को लगातार बढाते हुए गिरोह बढ़ रहा है। इनकी रोकथाम झुके-झुके नहीं होगी – लोकतंत्र और क़ानून के राज की हिफाजत के लिए उठकर खड़े होने का समय है। इन अनेक बुरी बातों के बीच अच्छी बात यह है कि देश की जनता ने इसे समझा है और संसदीय लोकतंत्र को समूचे लोकतंत्र की जीवनी शक्ति मानने वाले दल, संगठन, समूह और व्यक्ति अपनी-अपनी तरह से सडकों पर उतरे हैं।

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