
स्कूल हैं, लेकिन सुविधाएं नहीं” — नीति आयोग की रिपोर्ट ने खोली देश की शिक्षा व्यवस्था की पोल
वीना टंडन
नई दिल्ली, लोकसत्य।देश को विश्वगुरु बनाने और नई शिक्षा नीति के बड़े-बड़े दावों के बीच नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट ने सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत उजागर कर दी है। रिपोर्ट के मुताबिक देश में हजारों स्कूल आज भी बिना पानी, शौचालय, बिजली, प्रयोगशाला और पर्याप्त शिक्षकों के चल रहे हैं। कई स्कूल ऐसे भी हैं जहां छात्र ही नहीं हैं, जबकि लाखों बच्चे बीच में पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
नीति आयोग की रिपोर्ट ‘भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली’ में देशभर के स्कूलों के बुनियादी ढांचे, शिक्षकों, नामांकन और पढ़ाई की गुणवत्ता को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट बताती है कि देश के 98,592 स्कूलों में लड़कियों के लिए कार्यात्मक शौचालय नहीं हैं, जबकि 61,540 स्कूलों में कोई भी उपयोग योग्य शौचालय मौजूद नहीं है। इतना ही नहीं, करीब 14,505 स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा तक नहीं है और 59,829 स्कूलों में हाथ धोने की व्यवस्था नहीं है।
बिजली के मामले में भी तस्वीर पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। पिछले एक दशक में बिजली वाले स्कूलों की संख्या जरूर बढ़ी है, लेकिन आज भी देश के 1.19 लाख स्कूल बिजली से वंचित हैं। सरकारी माध्यमिक स्कूलों में केवल 51.7 प्रतिशत में ही विज्ञान प्रयोगशालाएं मौजूद हैं।
रिपोर्ट के अनुसार देश में 1,04,125 स्कूल ऐसे हैं जो सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। इनमें से लगभग 89 प्रतिशत स्कूल ग्रामीण इलाकों में हैं। बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश में प्राथमिक शिक्षकों के सबसे ज्यादा पद खाली हैं। बिहार में 2 लाख से ज्यादा पद रिक्त हैं। झारखंड में माध्यमिक स्कूलों का विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात 47:1 पहुंच चुका है, जबकि आदर्श अनुपात 10:1 से 18:1 माना जाता है।
शिक्षकों की गुणवत्ता को लेकर भी रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। गणित विषय में केवल 2 प्रतिशत शिक्षक ही 70 प्रतिशत से अधिक अंक हासिल कर पाए। औसत प्रदर्शन महज 46 प्रतिशत रहा। इसके अलावा शिक्षकों का करीब 14 प्रतिशत समय चुनाव, सर्वे और अन्य गैर-शैक्षणिक कार्यों में खर्च हो जाता है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि देश में 7,993 ऐसे स्कूल हैं जहां एक भी छात्र नामांकित नहीं है। पश्चिम बंगाल में ऐसे “फर्जी स्कूलों” की संख्या सबसे ज्यादा 3,812 बताई गई है, जबकि तेलंगाना दूसरे स्थान पर है।
स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। माध्यमिक स्तर पर देश की औसत ड्रॉपआउट दर 11.5 प्रतिशत है। पश्चिम बंगाल में यह 20 प्रतिशत तक पहुंच गई है। अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक में 18.3 प्रतिशत तथा असम में 17.5 प्रतिशत बच्चे बीच में पढ़ाई छोड़ रहे हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में भी स्थिति खराब हुई है। बिहार में माध्यमिक शिक्षा छोड़ने वाले बच्चों का प्रतिशत 2.98 से बढ़कर 9.3 प्रतिशत हो गया है, जबकि यूपी में यह 0.52 से बढ़कर 3 प्रतिशत पहुंच गया।
रिपोर्ट में शिक्षा पर सरकारी खर्च को भी बड़ा मुद्दा बताया गया है। भारत अपनी जीडीपी का केवल 4.6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में यह लगभग 5.9 प्रतिशत है। वहीं जर्मनी और फ्रांस करीब 5.4 प्रतिशत खर्च करते हैं।
‘परख’ आधारित शिक्षा मूल्यांकन में झारखंड, गुजरात और जम्मू-कश्मीर का प्रदर्शन कमजोर पाया गया, जबकि पंजाब, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र और राजस्थान बेहतर राज्यों में शामिल रहे।
नीति आयोग की यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि देश में शिक्षा व्यवस्था अभी भी बुनियादी सुविधाओं, शिक्षकों की कमी और गिरती गुणवत्ता जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है।






