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भारत-खाड़ी सहयोग परिषद: मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में अहम कदम

वीना टंडन
नई दिल्ली। दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं अब भारत को केवल एक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में देख रही हैं। इसी कड़ी में भारत और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के छह देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है।
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की मौजूदगी में दोनों पक्ष समझौते की रूपरेखा (Framework Agreement) पर हस्ताक्षर करेंगे, जो आगामी बातचीत के दायरे और प्राथमिकताओं को तय करेगा। यह प्रक्रिया लगभग दो दशकों से रुकी हुई थी, लेकिन अब इसे फिर से गति दी जा रही है।
खाड़ी सहयोग परिषद में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन शामिल हैं। भारत पहले ही UAE के साथ मुक्त व्यापार समझौता लागू कर चुका है और ओमान के साथ व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते पर भी हस्ताक्षर हो चुके हैं।
ऊर्जा और व्यापार का आधार
भारत और खाड़ी देशों के बीच व्यापार का मुख्य आधार ऊर्जा रहा है। भारत अपने कच्चे तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इन देशों से प्राप्त करता है, जबकि सऊदी अरब और कतर भारत की ऊर्जा सुरक्षा के महत्वपूर्ण स्तंभ बने हुए हैं। इसके अलावा, भारत खाड़ी देशों को कीमती पत्थर, धातु, कृत्रिम आभूषण, बिजली उपकरण, लोहा, इस्पात और रसायन निर्यात करता है।
आंकड़ों के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में भारत का निर्यात लगभग 57 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 121 अरब डॉलर से अधिक हो गया। कुल द्विपक्षीय व्यापार 178 अरब डॉलर से अधिक पहुंच चुका है, जो इस रिश्ते की मजबूती को दर्शाता है।
भारतीय प्रवासी श्रमिकों का योगदान
खाड़ी क्षेत्र भारतीय प्रवासी श्रमिकों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। लगभग तीन करोड़ भारतीय विदेश में रहते हैं, जिनमें बड़ी संख्या खाड़ी देशों में कार्यरत है। ये श्रमिक हर साल भारी धनराशि भारत भेजते हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी मदद है।
पहले भी भारत और खाड़ी देशों के बीच दो दौर की वार्ता हुई थी, लेकिन 2008 के बाद यह प्रक्रिया ठंडी पड़ गई थी। शुल्क में कटौती, निवेश सुरक्षा और आंतरिक प्राथमिकताओं पर मतभेद इसके कारण थे। अब निवेश संधि और व्यापार समझौते को अलग-अलग रास्तों पर रखकर गतिरोध तोड़ने की कोशिश की जा रही है।
नई पहल का महत्व
हाल के समय में भारत ने यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में प्रगति दिखाई है। ऐसे माहौल में खाड़ी क्षेत्र के साथ नई पहल यह संकेत देती है कि नई दिल्ली अब व्यापार समझौतों को केवल आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टिकोण से भी देख रही है।
विश्लेषकों के अनुसार, खाड़ी देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में बढ़ता कदम केवल वैश्विक राजनीति के बदलते परिदृश्य का संकेत नहीं है, बल्कि यह इस बात का भी सबूत है कि दुनिया की ताकत अब हथियारों से नहीं, बल्कि बाजार, आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा मार्गों से तय हो रही है।
चुनौतियाँ और सावधानियाँ
हालांकि, इस उत्साह में आंख मूंदना भी सही नहीं होगा। मुक्त व्यापार समझौता अपने बाजार को खोलने का अर्थ रखता है। यदि घरेलू उद्योग तैयार नहीं हुए, तो सस्ते आयात से कई क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए सरकार को केवल समझौते पर हस्ताक्षर करने में जल्दी नहीं करनी चाहिए, बल्कि घरेलू उद्योग, कृषि और सेवा क्षेत्र को मजबूत करने की भी तैयारी करनी होगी।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम पश्चिम एशिया में भारत की उपस्थिति को और मजबूत करेगा, जहां चीन भी तेजी से अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है।

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