
आधी रात चले एमसीडी के बुलडोजर से मचा बवाल,
फैज-ए-इलाही मस्जिद है 250 साल पुरानी
वीना टंडन
नई दिल्ली। दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में आधी रात को चले एमसीडी के बुलडोजर एक्शन ने इलाके का माहौल तनावपूर्ण बना दिया। अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए की गई इस कार्रवाई के दौरान हालात इतने बिगड़ गए कि पत्थरबाजी शुरू हो गई, पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और पूरा क्षेत्र छावनी में तब्दील हो गया।
इस घटनाक्रम ने न सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल खड़ा किया, बल्कि लोगों के मन में यह जिज्ञासा भी पैदा कर दी कि आखिर जिस फैज-ए-इलाही मस्जिद को लेकर विवाद हुआ है, वह कितनी पुरानी है, किसने बनवाई थी और इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है।
क्या है पूरा मामला?
एमसीडी ने तुर्कमान गेट इलाके में अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए देर रात बड़ा अभियान चलाया। फैज-ए-इलाही मस्जिद और उससे सटी जमीन पर बने कथित अवैध निर्माण को हटाने के लिए करीब 32 बुलडोजर लगाए गए। कार्रवाई शुरू होते ही कुछ स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया और देखते ही देखते स्थिति तनावपूर्ण हो गई।
आरोप है कि इस दौरान पुलिस और एमसीडी की टीम पर पत्थरबाजी की गई। हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस को आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम में पांच लोगों को हिरासत में लिया गया और इलाके में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए।
एमसीडी का दावा है कि करीब 85 प्रतिशत अवैध अतिक्रमण हटा दिया गया है, जबकि स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कार्रवाई बिना पर्याप्त पूर्व सूचना के की गई।
किसने बनवाई थी फैज-ए-इलाही मस्जिद?
फैज-ए-इलाही मस्जिद कोई नई इमारत नहीं है। इतिहासकारों के अनुसार यह मस्जिद करीब 250 साल पुरानी है और इसका निर्माण 18वीं शताब्दी में हुआ था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसका निर्माण महान सूफी संत हजरत शाह फैज-ए-इलाही ने करवाया था।
कहा जाता है कि इस मस्जिद को सिर्फ नमाज अदा करने की जगह के रूप में नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और प्रेम के केंद्र के तौर पर विकसित किया गया था। यह वह दौर था जब मुगल शासन अपने अंतिम चरण में था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मस्जिद का निर्माण मुगल बादशाह अहमद शाह बहादुर या शाह आलम द्वितीय के समय हुआ।
धार्मिक स्थल से आगे एक विरासत
फैज-ए-इलाही मस्जिद को केवल एक धार्मिक स्थल कहना इसके महत्व को सीमित करना होगा। यह सदियों से गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल रही है। यहां सूफी परंपरा की स्पष्ट झलक मिलती है, जहां धर्म से ऊपर इंसानियत, शांति और भाईचारे को प्राथमिकता दी जाती रही है।
कहा जाता है कि पुराने समय में यहां विभिन्न समुदायों के लोग एकत्र होते थे और सूफी संतों की शिक्षाओं से प्रेरणा लेते थे। ऐसे में मौजूदा विवाद ने न सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई, बल्कि इस ऐतिहासिक धरोहर के भविष्य को लेकर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

