
दिल्ली की साँसें — कब तक उधार लेंगे हम?
विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष
हर साल 5 जून आता है। हम पेड़ लगाते हैं, तस्वीरें खींचते हैं, भाषण देते हैं — और फिर 6 जून से वही ज़िंदगी। वही धुआँ, वही कूड़ा, वही काटे जाते पेड़।
दिल्ली — हमारी राजधानी, हमारा घर — आज दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिनी जाती है। AQI के आँकड़े देखकर डर लगता है। लेकिन इससे ज़्यादा डर इस बात का लगता है कि हम इन आँकड़ों के आदी होते जा रहे हैं।
यमुना रो रही है। कभी इस नदी को माँ कहते थे हम। आज उसमें झाग है, बदबू है, ज़हर है। और हम उसके किनारे सेल्फी लेते हैं।
पेड़ कटते हैं — चुपचाप। फ्लाईओवर बनते हैं, कॉलोनियाँ बनती हैं, मॉल बनते हैं। हरियाली सिकुड़ती जाती है। बच्चों के फेफड़े कमज़ोर होते हैं। अस्पतालों में भीड़ बढ़ती है।
लेकिन मैं निराश नहीं हूँ। क्योंकि मैंने झुग्गियों में रहने वाले बच्चों को पौधे लगाते देखा है। मैंने बुज़ुर्ग महिलाओं को अपने मोहल्ले की गलियाँ साफ़ करते देखा है। मैंने युवाओं को “नो प्लास्टिक” की मुहिम चलाते देखा है।
बदलाव वहीं से शुरू होता है — ज़मीन से।
अथाह वेलफेयर फाउंडेशन इस वर्ष 5,000 पौधे लगाने का संकल्प लेकर चल रही है — दिल्ली की सरकारी स्कूलों, झुग्गी बस्तियों और सार्वजनिक स्थानों पर। क्योंकि हम मानते हैं कि पर्यावरण कोई सरकार अकेले नहीं बचा सकती — इसे हम सबको मिलकर बचाना होगा।
आज, इस World Environment Day पर, बस एक काम करें —
एक पौधा लगाएँ। एक पड़ोसी को जागरूक करें। एक प्लास्टिक बैग कम करें।
दिल्ली की साँसें हमारी ज़िम्मेदारी हैं। और ज़िम्मेदारी निभाने की शुरुआत आज से होती है — अभी से होती है।
🌱 “धरती माँ को बचाना है, तो पहले खुद को बदलना होगा।”
डॉ. अर्चना गौहर
संस्थापक एवं अध्यक्ष — अथाह वेलफेयर फाउंडेशन, नई दिल्ली
(Reg. NGO | 12A | 80G | Darpan I CSR1 Registered)







