
ग़ज़ल : क्या अब भी वहाँ
क्या अब भी छत पर चाँद को बच्चे देखा करते हैं
क्या अब भी रात के सन्नाटे में सपने जागा करते हैं
क्या अब भी माँ दरवाज़े पर राह किसी की तकती है
क्या अब भी देर से आने पर आँख किसी की भरती है
क्या अब भी गाँव के पीपल पर महफ़िल लगती होगी
क्या अब भी बूढ़ों की बातों में दुनिया बसती होगी
क्या अब भी सावन आते ही झूले पड़ जाते होंगे
क्या अब भी भीगे मौसम में दिल गीत सुनाते होंगे
क्या अब भी कच्चे आँगन में बारिश नाच दिखाती है
क्या अब भी मिट्टी की ख़ुशबू बीते दिन याद दिलाती है
क्या अब भी मेलों में कोई बिछड़ा मिल जाता होगा
क्या अब भी अनजाना चेहरा अपना बन जाता होगा
क्या अब भी ख़त में लोग किसी का नाम लिखा करते हैं
क्या अब भी चुपके-चुपके लोग किसी को याद किया करते हैं
क्या अब भी दोस्त पुराने मिलने आते होंगे
क्या अब भी बीते क़िस्सों पर सब हँसते-हँसते रोते होंगे
क्या अब भी कोई मेरी राहों में आँख बिछाता है
क्या अब भी मेरा गाँव मुझे अपना कहकर बुलाता है
*✍️शिराज़ अख़्तर*





