
उजड़ते घर, उजड़ती पीढ़ियां: विकास के नाम पर किसका विनाश?
असगर अली के कलम से
भीषण गर्मी में आसमान से आग बरस रही है, और ज़मीन पर बुलडोज़र। पूरे देश में ‘अतिक्रमण हटाओ’ अभियान की आंधी चल रही है। इस आंधी में सबसे पहले उजड़ता है गरीब का आशियाना — वह घर जहां दूसरी, तीसरी, चौथी पीढ़ी ने जन्म लिया, ब्याह-शादी की, छोटी सी दुकान से बच्चों को पढ़ाया।
आज अचानक नोटिस थमा दिया जाता है: “यह ज़मीन तुम्हारी नहीं, सरकार की है।”
सवाल सीधा है — क्या ये लोग इस देश के नागरिक नहीं?
आधार कार्ड, वोटर आईडी, 30 साल से बिजली-पानी का बिल — सब इसी पते पर। फिर भी एक दस्तखत से दशकों का रिश्ता ‘अवैध’ हो जाता है। घर टूटने के बाद बुज़ुर्ग कहां जाएं? स्कूल जाती बच्ची कहां सोए? रोज़गार कौन देगा? पुनर्वास की फाइलें दफ्तर में सड़ती हैं, परिवार सड़क पर तपता है। आग लगे तो दमकल भी नहीं पहुंचती।
यह समाजवाद है या नंगा पूंजीवाद?
ज़मीन की कीमतें बढ़ते ही बड़ी परियोजनाओं के लिए रास्ता साफ किया जाता है। विडंबना देखिए — वही तंत्र जो कल तक रजिस्ट्री कराता था, नक्शा पास करता था, पट्टा बांटता था, आज वही ‘अवैध’ बताकर बुलडोज़र चला रहा है। गलती सिस्टम की, सज़ा सिर्फ गरीब को?
संविधान समाजवादी गणराज्य की बात करता है, पर ज़मीन पर पूंजी का कब्ज़ा दिखता है। ताकतवर की ज़रूरत ‘विकास’ है, गरीब की ज़रूरत ‘अतिक्रमण’। धर्म-जाति के नाम पर भीड़ जुट जाती है, पर जब छप्पर उजड़ता है तो कोई नहीं आता।
चेतावनी साफ है: विकास ज़रूरी है, पर पहले पुनर्वास दो। 30-40 साल से बसे लोगों को उजाड़ना नहीं, नियमित करो। जिस अफसर ने नक्शा पास किया, उसकी जवाबदेही तय करो। गर्मी-बरसात में रातों-रात उजाड़ना बंद करो।
अगर विकास की नींव में किसी मासूम के घर की ईंटें लगी हैं, तो वह इमारत खोखली है। जब तीसरी पीढ़ी से कहोगे “यह देश तुम्हारा नहीं”, तो वह पूछेगी — “फिर हमारा देश कौन सा है?”
बुलडोज़र के पास इस सवाल का जवाब नहीं है। जवाब देना होगा हमें। क्योंकि घर सिर्फ दीवार नहीं, यादें होती हैं। और यादें उजाड़ने का लाइसेंस संविधान किसी को नहीं देता।






